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समय की रफ़्तार

हमे लगता हैं...............   हम तो अभी बच्चे हैं।    समय आपका बचपना कैसे  छिन लेता है।   पता ही नही चलता।  हमे लगता है.................  हम तो अभी जवान हो गए।  उसके यौवन उत्साह में बहने लगते हैं।  समय अपनी रफ़्तार तेज करके  हमे जिम्मेदारियों का एहसास कराता है।  फिर हम जिम्मेदारियों को निभाने में खुश होने लगते है।  हमें लगता है..........  हमने सब कुछ पा लिया है।   फिर समय अपनी रफ़्तार बढाता है।   और हमे कहता है..............  थोडी देर रुककर सोच ले।   तू क्या जी रहा है।   फिर इंसान सोचने लगता है।   और खुद को जिने लगता हैं।  फिर एक बार समय अपनी रफ़्तार तेज करता है।   और हमे  प्यार से बताता है कि.............  अब तुम्हारा समय ख़तम हुआ हैं।  हमे लगता है हमने जिया क्या? उत्तर आता है.............   तुमने जिम्मेदारियों को जिया।   तुमने रिश्ते नातों को जिया।   तुमने रितिरिवाज़ और परंपराओं को जिया। ...

प्रेम

प्रेम आझादी हैं।  प्रेम स्थिरता हैं।  प्रेम शांति हैं।  प्रेम आनंद हैं।  प्रेम विश्वास हैं ।  प्रेम ऊर्जा हैं ।  प्रेम उत्साह हैं।  प्रेम एहसास हैं ।  प्रेम परमात्मा हैं ।  बस सवाल तुम्हारी परिपक्वता का हैं....... - डॉ. अस्मिता

स्त्री या मनुष्य

                                                    दुनिया तुम्हें कहेगी तुम स्त्री हो .........  तुम कहना मैं मनुष्य हूँ।  दुनिया तुम्हें कहेगी तुम देह हो........  तुम कहना मैं बुद्धि हूँ ।  दुनिया तुम्हें कहेगी तुम रिश्ता हो .......  तुम कहना मैं फरिश्ता हूँ ।  डॉ. अस्मिता 

पहचान

तुम जीवित होने तक दुनिया तुम्हें तुम्हारी  पहचान पुछेगी तुम्हारे पास ये है क्या? वो है क्या?  सभी सवाल 'है क्या' वाले होंगे....... तुम 'हो क्या'?  यह तुम्हें कोई नहीं पूछेगा  जब तुम मरोगे तो लोग कहेंगे  'इंसान अच्छा था'।   अर्थात............  तुम मरने के बाद  तुम्हें इंसान समझा जायेगा।   तब तक तुम्हारी किमत  तुम्हारे पास है क्या?  से नापी जायेगी............  इसलिए मरने से पहले  तुम अपनी किमत  निर्धारित करना  क्योंकी   तुम ही निर्धारक हो मनुष्यता के..... # डॉ. अस्मिता #

बगावत

जिस दिन  तुम्हें लगे  जीवन में कुछ खास नहीं बचा जीवन उदास लगे  जीवन का रस कम हो जाये ...... उसी दिन तुम  अपनी मन की आवाज सूनना  और अपनी पसंद का  जीवन जीने लगना  यही सही समय है । अपने आपको जीने का......  यही समय है।  अपने आप को मुक्ति  दिलाने का ..... बरसों  से जो तुमने  अपनी आत्मा को सुन्न करके रखा है  बरसों से जो तुमने  अपनी आवाज़ को दबाया है,। बरसों से जो तुमने  अपने शब्दों  को  नकली बनाकर रखा है जिंदगी में एक बार तो  बगावत करके देखना  तूम्हें  जिंदगी मिल जायेगी। डॉ. अस्मिता
In my eyes :      रिश्ते    हर कोई अगर        अपने रिश्ते  के बारे में....  लिखने लगे         तो रिश्ते  नहीं रहेंगे.......  डॉ. अस्मिता