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Spirituality and human being

By nature human being is a thinking animal because of his thinking mind he/her try to think on everything which have direct existence or indirect existence. All material things have direct existence and soal have indirect existence. Human body wants material and human soul wants spirituality. The simple meaning of spirituality is the right way of thinking.  Material things have capacity to satisfy human body and also create the happiness. Human being always search the happiness in their life but unfortunately sadness also the part and parcel of their life. Midline of the happiness and sadness is spirituality. Spirituality have no happiness and sadness there is the peace. When human being do got the  peace he/she will free from the good and bad feelings. 

मानव सभ्यता एवं श्रम : एक विश्लेषण - अस्मिता राजुरकर

             मानव सभ्यता एवं श्रम : एक विश्लेषण      श्रम मनुष्य की बुनियादी गतिविधि है। मानव सभ्यता का विकास श्रम शक्ति का ही परिणाम है। मानव सभ्यता के शुरुआती दौर में अपने मानव अस्तित्व के लिए श्रम को महत्वपूर्ण माना। कंद मूल और प्राणियों की शिकार से अपनी आजीविका चलाने से लेकर जमीन जोतने और जमीन का उत्पादन बढ़ाने के लिए औज़ार तैयार करने तथा जानवरों और मनुष्य की संख्या बढ़ाने तक सफर उसने पूरा किया। इस सफर के दौरान ही निजी संपत्ति की संकल्पना का विकास हुआ और पुरुष अपने समकक्ष जेंडर के बारे में सोचने लगा। फ़्रेडरिक एंगेल्स निजी संपत्ति की संकल्पना को ही महिलाओं की गुलामी या अधीनता की शुरुआत मानते हैं । महिलाओं में पुनरुत्पादन की नैसर्गिक शक्ति होने के कारण वंश की निर्मिति में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी और निजी संपत्ति के लिए वंश की शुद्धता जरूरी थी। इसका परिणाम महिलाओं की गतिशीलता पर हुआ। उनके श्रम कार्यों को सीमित किया गया और कई पीढ़ियों तक महिलाएँ एक सीमित दायरे में श्रम कार्यों को करने के कारण वह ‘ नैसर्गिक...

वैश्विक बौद्धिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करती सावित्रीबाई फुले - अस्मिता राजुरकर

दुनिया में दो तरह की बौद्धिक परंपराएँ है , एक परंपरा समाज को निरंतर बेहतर बनाने के लिए और व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकार बहाल करने के लिए काम करती हैं तो दूसरी परंपरा समाज को लगातार यथास्थिति में रखने के लिए बौद्धिकता का विकास करती हैं। इन दो बौद्धिक परंपराओं में सावित्रीबाई फुले की एक बुद्धिजीवी के रूप में लोकेशन को देखते हैं , तो हम पाते हैं कि सावित्रीबाई विश्व की उस बौद्धिक संस्कृति और परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं जो प्लेटो , अरस्तू से शुरू होकर डॉ. अम्बेडकर तक एक समाजोन्मुख बौद्धिकता का विकास करती हैं , जो व्यक्ति को समाज में एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार्यता प्राप्त करने के लिए किस तरह की सोच का होना आवश्यक है और समाज को गतिशील रखने के लिए स्त्री और पुरुषों के बीच जो सामाजिक संबंध है उसे निरंतर बेहतर बनाने के लिए अपना बौद्धिक एवं सामाजिक योगदान देते हैं।           सावित्रीबाई फुले अपने समय में एक वैश्विक बौद्धिक परंपरा को बनाने में योगदान देती हैं , चाहे वो स्त्री पुरुष समानता हो , भाषा का सवाल हो या फिर सामाजिक मातृत्व...

जातिगत श्रमिक गतिविधियों में महिलाएँ - अस्मिता राजुरकर

                                                                श्रम मनुष्य जीवन की बुनियादी गतिविधि और जीवन की हकीकत है। विश्व में जहां जाति व्यवस्था विद्यमान नहीं है वहा भी लोग श्रम करते हैं। लेकिन भारत और विश्व के अन्य देशों के श्रमिक गतिविधियों में अंतर इतना है कि यहाँ एक व्यक्ति जिस काम को करता/करती है उसकी आनेवाली पीढ़ियों को वही काम पीढ़ी दर पीढ़ी करना पड़ता है। श्रम के इस जातिगत व्यवस्थापन में श्रम का कोई मूल्य नहीं रहता और न ही उस श्रमिक गतिविधियों को संपन्न करने वाले समूह के प्रति सम्मान। बल्कि उस श्रम कार्य को और उस जाति में जन्म लेने को ‘ पाप ’ की श्रेणी में रखकर एक सहज प्रक्रिया का हिस्सा समझा जाता है।             श्रम पहले हैं और जाति बाद में। भारत में जो समूह जिस तरह के श्रम कार्यों को करते थे उन्हें जाति का टैग लगाकर स्थायी क...