श्रम
मनुष्य जीवन की बुनियादी गतिविधि और जीवन की हकीकत है। विश्व में जहां जाति
व्यवस्था विद्यमान नहीं है वहा भी लोग श्रम करते हैं। लेकिन भारत और विश्व के अन्य
देशों के श्रमिक गतिविधियों में अंतर इतना है कि यहाँ एक व्यक्ति जिस काम को करता/करती
है उसकी आनेवाली पीढ़ियों को वही काम पीढ़ी दर पीढ़ी करना पड़ता है। श्रम के इस जातिगत
व्यवस्थापन में श्रम का कोई मूल्य नहीं रहता और न ही उस श्रमिक गतिविधियों को
संपन्न करने वाले समूह के प्रति सम्मान। बल्कि उस श्रम कार्य को और उस जाति में
जन्म लेने को ‘पाप’ की श्रेणी में
रखकर एक सहज प्रक्रिया का हिस्सा समझा जाता है।
श्रम
पहले हैं और जाति बाद में। भारत में जो समूह जिस तरह के श्रम कार्यों को करते थे
उन्हें जाति का टैग लगाकर स्थायी कर दिया गया। इस जातिगत षड्यंत्र से कुछ समूहों
को पीढ़ी दर पीढ़ी ‘आरामदायक’ जिंदगी विरासत में मिलती रही। इस पूरे भारतीय व्यवस्था के परिदृश्य में
सबसे उपेक्षित वह जातियाँ हुई जिन्होंने भारतीय सभ्यता, समाज, संस्कृति को खड़ा करने और विकसित करने में अपने शारीरिक, बौद्धिक और कौशल से परिपूर्ण श्रम गतिविधियों के माध्यम से महत्वपूर्ण
योगदान दिया। आज इन समूहों को उपेक्षित और हाशियाकृत किया गया। लेकिन उन्हें
हाशियाकृत करने से उनके श्रम की गरिमा, उसका मूल्य और
ऐतिहासिक योगदान कम नहीं हो पाया। भारत के जिन समूह के पास समाज को विकसित करने का
ज्ञान, कौशल और कला थी और आज भी है वैसे कुछ समूह की महिलाओं
के कार्य, योगदान और जाति व्यवस्था में उनका दर्जा इन
बिन्दुओं को केंद्र में रखकर उसपर चर्चा करने की कोशिश इस शोधपत्र में की गई है
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नाई महिलाएँ
भारत के विभिन्न क्षेत्रों
में नाइयों को अलग-अलग जातीय नामों से जाना जाता है। महाराष्ट्र में उन्हें मराठी
भाषा में म्हाली कहते थे अब न्हावी कहा जाता है, वही तेलुगु
भाषी क्षेत्रों में उन्हें मंगाली कहा जाता है; तमिलनाडु में
वे नाविदन कहलाते हैं और अधिकांश हिन्दी भाषी क्षेत्रों में उन्हें नाई, या फिर उस्ताद और हज्जाम भी कहा जाता है। महाराष्ट्र में नाई महिलाएँ प्रसव
करने और नए जन्में बच्चे का एक विधि के रूप में मुंडन करना आदि कार्यों को संपन्न
करती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इनके कामों में अंतर दिखाई पड़ता है। कांचा
आइलैया कहते है कि, नाई महिलाएँ प्रारंभिक नर्सें हैं। नाई
समुदाय की महिलाओं ने गावों में प्रसव करवाने की ज़िम्मेदारी निभाई है। उत्तर भारत
में वे ‘दाई’ कहलाती हैं और आज की
प्रशिक्षित परिचारिकाओं का पारंपारिक रूप हैं। वे प्रसूति–विशेषज्ञ का काम करते
हुए प्रसव में महिलाओं की मदद करती हैं। आज भी भारत में पचास प्रतिशत से ज्यादा
प्रसूतियाँ इन अति-कुशल ग्रामीण दाइयों द्वारा कराई जाती हैं। नाई समुदाय की
महिलाओं द्वारा की जाने वाली सेवा-सुश्रुषा और उनके अनौपचारिक चिकित्सकीय कौशल, विशेषकर गर्भावस्था के दौरान उनके द्वारा की जाने वाली देखभाल की महत्ता
को आज कई चिकित्सक भी स्वीकार करते हैं। नाई समुदाय की महिलाएँ कोख में उलटे
शिशुओं (प्रसव के दौरान जिनके पैर पहले सामने आते हैं) को सीधा करने में कामयाब
रही हैं। वे सामान्य प्रसूति कराने में महिलाओं की मदद करती हैं। गाने गाकर, गुनगुनाकर, जपकर और अपने साथ सांस लेने के व्यायाम
करवाकर, वे जन्म देने वाली माताओं का दर्द बाँट लेती हैं। वे
जन्म दे रही माताओं को शारीरिक सहारा देती हैं। वे प्रसव के दौरान सही शारीरिक
मुद्रा के विषय में सुझाव भी देती हैं और सुरक्षित रूप से शिशु का प्रसव कराने में
मदद करती हैं। वही लीला दुबे के अनुसार विंध्य के उत्तर में नाइन (नाई की स्त्री)
अपने जजमान के परिवार की स्त्रियों को निजी सेवाएँ प्रदान करती है। इन सेवाओं में
नाखून काटना, पैरों में आलता-महावर लगाना, जच्चा और बच्चा को खास ढंग से तेल लगाना व नहलाना,
भोज के अवसरों पर दोना-पत्तल पहुँचाना तथा विवाह समारोह के दौरान वधू के साथ रहना
शामिल है। नाइन ये सेवाएँ जजमान परिवारों के अतिरिक्त उन परिवारों को भी देती है
जो नकद भुकतान कर उससे काम लेते हैं।
प्रसूतिज्ञ के रूप में कुशल दाइयाँ
दाइयों का काम नाई महिलाओं
के साथ ही मातंग और चमार महिलाएँ भी करती थी। क्षेत्र के अनुसार विभिन्न जातियाँ
इस कार्य को संपन्न करती है। भारत के कई क्षेत्रों में दलित महिलाएँ ही प्रसव
संबंधी काम करती हैं। मध्य उत्तर प्रदेश के चमार इसका उदाहरण है। भारत में
महिलाएँ उनके पारंपरिक ज्ञान और देशी चिकित्सा पद्धतियों, जैसे – आयुर्वेद, यूनानी और सिद्धा आदि का उपयोग कर
चिकित्सा तथा प्रसूति कार्यों को करती थी क्योंकि भारत में प्रसूति समय में
पुरुषों की उपस्थिती को उचित नहीं माना जाता था। साथ ही पवित्र-अपवित्र और
शुद्ध-अशुद्ध की संकल्पनाएँ भी काफी कठोर थी। आयुर्वेद के ज्ञानी लोग प्रसूति कार्य
को अशुद्ध और अपवित्र मानकर उससे दूर रहना ही पसंद करते थे। इसलिए प्रसूतिशास्त्र
की विशेषज्ञ महिलाएँ ही होती थीं जो देशी पद्धतियों का उपयोग कर प्रसूति कार्यों
को बड़ी कुशलता के साथ करती थी और आज भी करती है।
आधुनिक चिकित्सा में जो प्रसव की तकनीक है उससे ज्यादा उपयोगी तकनीक दाइयाँ
के पास थी/है। वे अपने पारंपारिक ज्ञान और अनुभव के आधार पर बड़ी सक्षमता और दक्षता
के साथ प्रसव को संपन्न करती थीं। ‘दाइयाँ, प्रसव का समय पास आने का पता एक रोचक तरीके से लगाती हैं। बिहार और
तमिलनाडु की दाइयों के अनुसार माँ की नाभि पर तेल उड़ेला जाता है और उसके बहाव का
अवलोकन किया जाता है। यदि तेल बिना रुके नीचे बहता है तो इसका अर्थ है कि बच्चे का
जन्म जल्द ही होने वाला है। दाइयों द्वारा प्रसव के दौरान रखवाई जाने वाली शारीरिक
मुद्रा में और आधुनिक अस्पतालों में प्राय: रखवाई जाने वाली “लीथोटोमी” मुद्रा
(सहारों पर पाँव ऊंचे रखकर लेटना) में आमूल अंतर है। दाइयाँ घुटनों के बल बैठने की
मुद्रा को आदर्श मानती हैं, जिसमें माँ के लिए पूरी शक्ति
लगाना और बच्चे को जन्म देना आसान हो जाता है। दाइयों के अनुसार लीथोटोमी की
मुद्रा भ्रूण को माँ की छाती की ओर ले आती है जिससे संकुचन शुरू होने पर माँ के
लिए बच्चे को जन्म देना कठिन हो जाता है। वास्तव में लीथोटोमी मुद्रा को माँ की
बजाय जन्म कराने वाले चिकित्सक की सुविधा के लिए अपनाया जाता है। जब माँ निढाल हो
जाती है तो दाइयाँ उसे घुटनों को ऊपर उठाए हुए लेटी स्थिति में रखती हैं। इस
मुद्रा में संकुचन शुरू होने पर माँ को अपनी जंघाओं को पकड़े रखना पड़ता है और उसके
सिर व पीठ को उठाकर सहारा दिया जाता है। यहाँ भी मुख्य विचार यही है कि माँ द्वारा
ताकत लगाने और बच्चे को जन्म देने कि प्रक्रिया को आसान और प्रभावी बनाया जाए।
दाई
का काम एक पवित्र काम है। क्योंकि वह मानव वंश को इस धरती पर सही तरीके से लाने और
उसे स्वस्थ रखने में मदत करती है। संपूर्ण विश्व में मानव वंश को बचाने और उसे सही
स्थिति में रखने में दाई महिलाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया, जब ऐलोपैथी का आविष्कार नहीं हुआ था और ऐलोपैथी आने के बाद भी देश के सभी
हिस्सों में सेवाएँ देने में असमर्थ है। ऐसी स्थिति में लोगों को दाइयाँ ही सेवाएँ
प्रदान करती रही हैं।
दाई महिलाओं का सामाजिक दर्जा
भारतीय
जाति व्यवस्था में दाई का काम करनेवाली महिलाएँ सेवक जातियो से ताल्लुक रखती है
जिसे निचली जाति माना जाता है। इसलिए इनके द्वारा दी जानेवाली सेवाओं को भी गौण
मानकर दाई महिलाओं के साथ अछूत और नौकरों जैसा व्यवहार किया जाता है। साथ ही उनके
द्वारा किए गए प्रसव कार्य को अस्वच्छ और गंदा काम समझा जाता है।
मातंग महिलाएँ
मातंग महिलाएँ घर की स्वच्छता के लिए
जरूरी झाड़ू बनाने का काम करती है। यह काम काफी मेहनत भरा होता है। इसके लिए जंगल जाकर
झाड़ू बनाने का साहित्य इकट्ठा किया जाता है उसे साफ करके झाड़ू बनाने के लायक बनाया
जाता है और फिर बड़ी कुशलता से उसे झाड़ू का रूप दिया जाता है। यह घर की स्वच्छता और
अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी साधन है। इस कार्य के साथ ही मातंग महिलाएँ प्रसव का
भी महत्वपूर्ण काम करती है। मातंग महिलाएँ प्रसव से संबंधित ज्ञान और कौशल से
परिपूर्ण होती है। महाराष्ट्र में इन्हें ‘मांगिन’ और इनकी जाति को गाँव की भाषा में ‘मांग’ कहा जाता है। आज भी यह महिलाएँ गांवों में प्रसव करना, जच्चा और बच्चा को तेल लगाना आदि प्रसव संबंधित कार्यों को करती है।
मांग-गारुड़ी
मांग गारुड़ी महिलाएँ गाँव-गाँव घूमकर
शौर्य दिखाने वाले खेल करती हैं। जिसमें तार पर चलना, मुंह से आग निकालना, तीव्र गति से अपने शरीर से
रिंग निकालना, अपनी छोटी-छोटी बच्चियों को अलग- अलग स्थिति
में घूमाना, बंदर, भालु को प्रशिक्षित
कर उन्हें नचाना आदि का इसमें समावेश होता है। इस प्रकार का ‘एडवेंचर’ दिखाकर लोगों का मनोरंजन किया जाता है। जीवन
यापन करने के लिए यही काम मांग-गारुड़ी महिलाएँ करती थी और कुछ हिस्से में आज भी
करती है। लेकिन समय के साथ मनोरंजन के साधन बदल गए और जरूरते भी बढ़ गई जिससे इस
कला के साथ जीवन यापन करना कठिन हो गया। इसलिए आज कुछ हिस्सों में मांग-गारुड़ी
महिलाएँ बहुत ही कम मजदूरी पर शराब छानने का काम करती है।
जाति
आधारित सामाजिक दर्जा
जाति व्यवस्था में
निचली जाती का दर्जा होने के कारण इन्हें अमूमन गाँव के बाहर ही रखा जाता था।
इसलिए उत्पादन के अन्य साधनों पर इस जाति को अधिकार प्राप्त नहीं हुए और इनके पास
जो कौशल, ज्ञान और हुनर था उसे भी निम्न दर्जें का माना गया।
इसलिए इतना हुनर होने के बावजुद भी यह महिलाएँ कभी बस या ट्रेन स्थानकों या ट्रेन
में छोटी-मोटी चोरी करके अपने जीवन यापन की व्यवस्था करने के लिए मजबूर है। आज इसी
हुनर को जब ऊँचे जाति/वर्ग के लोग टीव्ही चैनलों पर दिखा रहे हैं तो उसे “इंडियाज़
टैलेंट” के रुप में गौरवान्वित करके दिखाया जा रहा है। विडंबना यह है कि जिनकी
पीढ़ियों ने इस ज्ञान और कौशल और हुनर को सँजोये रखा वे आज गैरकानूनी समझे जाने
वाले कामों को करके पुलिस से प्रताड़ित होने और जेल जाने के लिए मजबूर हैं। ऐसी
परिस्थितियों में इन महिलाओं के बच्चों का बचपन इसी समाजीकरण की प्रक्रिया से होके
गुजरता है। फिर इनके बच्चों के “टैलेंट” को हाशिये पर रखकर समाज एक अपराधी पीढ़ी को
पैदा करता है।
कोल्हाटी
महिलाएँ
कला की अनेक महत्वपूर्ण विधावों में
से एक ‘नृत्य’ कला ऐसी कला है जो साकार करने में कठिन है।
इसलिए यह कला निरंतर साधना और एकाग्रता की मांग करती है। नृत्य कला संगीत और गायन
कला के भाव को अर्थ प्रदान कर उस अर्थ को मूर्त रूप में प्रस्तुत करती है। ऐसी
नृत्य कला में कोल्हाटी समुदाय की महिलाएँ ज्ञानी और निष्णात है। महाराष्ट्र की
नृत्य कला के रूप में प्रसिद्ध तमाशा एवं लावणी नृत्य की यह महिलाएँ विशेषज्ञ है और
इस नृत्य कला को इन्होंने विकसित कर आज तक जीवित रखा। जब मनोरंजन के इलेक्ट्रोनिक
साधन उपलब्ध नहीं थे और गावों से शहर मनोरंजन के उद्देश्य से जाने के लिए पर्याप्त
आवाजाही की व्यवस्था नहीं थी उस वक्त तमाशा और लावणी के माध्यम से कोल्हाटी
महिलाएँ लोगों का मनोरंजन करती थी। इस नृत्य कला प्रकार को जीवित रखकर इन महिलाओं
ने भारतीय साहित्य, कला, संस्कृति को
जीवित रखने और विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
जाति आधारित सामाजिक दर्जा
जाति आधारित समाज व्यवस्था में
कोल्हाटी जाति ‘नीची जाति’ मानी जाती
है। नीची जाति के पास चाहे जितना हुनर और कौशल हो उसे जाति व्यवस्था में निम्न
दर्जे का समझा जाता है। इसलिए कोल्हाटी महिलाओं की नृत्य कला को सही दिशा और सही
फ्लैटफार्म नहीं मिल पाया। शोषक जातियों ने कोल्हाटी महिलाओं की नृत्य कला का अपने
मनोरंजन के लिए उपयोग तो किया ही, साथ ही इन महिलाओं को भी
उपभोग की वस्तु बनाने के लिए कई गलत मान्यताओं का संहिताकरण भी किया। जिसमें
कोल्हाटी महिलाओं को (खासकर जो दिखने में सुंदर है) को विवाह न करना बंधनकारक किया
गया, इनके लिए एक रस्म इजात की गई जिसे “चिरा की रस्म” कहा जाता है, जो विवाह की
रस्म के जैसे ही होती है, लेकिन इसमें फर्क यह है कि जो
व्यक्ति चिरा करता है, वह कोल्हाटी महिला के परिवार को इसका
मुआवजा देता है, जो जमीन, गहने या पैसे
के रूप में होता है। इसका दूसरा फर्क यह है कि जो आदमी चिरा करता है वह उसका मन
भरने के बाद उस महिला को छोड़कर जा सकता है और उस आदमी की कोल्हाटी महिला के लिए
कोई ज़िम्मेदारी नहीं होती। चिरा किए पुरुष का संरक्षण खतम होने के कारण यह महिला
मंडलियों में नृत्य कर अपना और अपने परिवार का पेट पालती है। आज कोल्हाटी महिलाओं
की नृत्य कला को निम्न जाति का मानकर सम्मान के साथ नहीं देखा जाता। लेकिन इसी
लावणी और तमाशा कला प्रकार को आज महाराष्ट्र के टीव्ही चैनलों पर ऊंची जाति/वर्ग
की महिलाएँ प्रस्तुत कर रही है जिसे भरपूर सम्मान के साथ देखा जाता है साथ ही
इसमें भरपूर धन और ग्लैमर है। लेकिन कोल्हाटी महिलाएँ जिनकी कई पीढ़ियाँ इस नृत्य
कला को करती रही आज उनकी पीढ़ी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी दर दर भटक रही हैं। जिसकी
सत्य कहानी एक कोल्हाटी नृत्यांगना शांताबाई काले के बेटे किशोर शांताबाई काले ने
अपनी प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण रचना “छोरा कोल्हाटी का” में व्यक्त की है।
मातंग/महार/कोली महिलाएँ
यह महिलाएँ नृत्य, गायन और संगीत कला में निपुण महिलाएँ थी। जिसके प्रमाण हमें आज भी देखने
को मिलते हैं। आज भी मुरली महिलाएँ परंपारिक वाद्य बजाती है,
नृत्य और गायन करती है। इन कलाओं को प्रथा
परंपरा के नाम पर ऊंचे वर्ग के लोगों ने अपने मनोरंजन और सत्ता के लिए उपयोग किया
जिसे वाघ्या-मुरली प्रथा के नाम पर प्रस्थापित किया गया। मुरली बननेवाली अधिकतर
लड़कियाँ मातंग जाति की होती है और कुछ मात्रा में महार, कोली
और अन्य जाति की भी महिलाएँ होती है। कोल्हाटी महिलाओं की तरह वाघ्या मुरली यह भी प्राचीन सांस्कृतिक प्रथा समझी जाती है।
‘वाघ्या – मुरली’ इस प्रकार में दलित लड़कियों का ‘खंडोबा’ नाम के भगवान से विवाह रचाया जाता है। इस
अस्तित्व में ना होनेवाले भगवान के कृपा से यह मातंग स्त्री अपना उपेक्षित जीवन
वाघ्या के साथ गाँव-गाँव घूमकर नृत्य एवं गायन करके या मंडलियों में अपनी कला
प्रदर्शित करके निकालती है।
वडार
और लुहार महिलाएँ
पत्थर से गृह उपयोगी
वस्तु बनाना जैसे, पाटा-वरवंटा जो मिक्सर का काम
करता है, खल-बत्ता यह भी हार्ड वस्तुओं को पीसने के लिए काम
में आता है। पारंपरिक आंटा चक्की जिसे ‘जातं’ कहते हैं को बनाने के साथ ही खेती के लिए बांध बनाना, गिट्टी फोड़ना, नालियाँ बनाना और पुरुषों के साथ
सूअर पकड़ने का काम वडार महिलाएँ बड़ी कुशलता और मेहनत के साथ करती है।
लुहार महिलाओं ने खेती के लिए जरूरी
बुनियादी औजारों के विज्ञान को विकसित किया। यह महिलाएँ खेती के लिए जरूरी फांस
बनाना, कुराढ़, फावडा और अन्य खेती से संबंधित जरूरी
साहित्य बनाती है। इन साहित्य को बनाने के लिए किसी मशीन का उपयोग नहीं होता है यह सभी औज़ार
हाथ से कडकड़ी धूप में आंग के साथ खेलते हुए बनाती है। वडार और लुहार महिलाएँ सबसे
ज्यादा मेहनती कार्यों को करती है। इन महिलाओं को काम करते देख पुरुष और महिलाओं
में शारीरिक अंतर और शक्ति में फर्क होने के सारे जीववैज्ञानिक दावे खोकले लगने
लगते हैं। बच्चे को साथ में रखकर यह महिलाएँ इन अति श्रम भरे कार्य को अंजाम देती
है।
सामाजिक
दर्जा
जाति व्यवस्था में इन महिलाओं को
घुमंतू जातियों में गिना जाता है। घुमंतू होने के कारण इनका कोई निश्चित गाँव नहीं
होता और निश्चित गाँव ना होने के कारण नागरिकता से संबंधित प्रश्न उपस्थित होते
हैं। अर्थात इन प्रश्नों को उपस्थित किया जाता हैं। आज इन महिलाओं का कोई सम्मानजनक
सामाजिक दर्जा नहीं है, यह अपने परिवार के साथ शहरों
के फुटपाथ और गांवों के बाहर रहने के लिए मजबूर है। फुट पाथ और गांवों के बाहर
रहने से ‘मर्द लोग’ उनके ‘बेड़े’ (रहने का स्थान) के इर्द-गिर्द घूमकर शिकार
करने की फिराख़ में रहते हैं। जिस मेहनत और कौशल पूर्ण कार्यों को यह महिलाएँ करती
है उसका पर्याप्त मूल्य इन्हें ना मिलने के कारण गरीबी है जिसका परिणाम पूरे जीवन
यापन के स्तर और अगली पीढ़ी के भविष्य पर साफ दिखाई पड़ता है।
धोबी
महिलाएँ
भारत में इतिहास के किसी बिन्दु पर
कपड़ों की धुलाई से सम्बद्ध लोगों ने एक विशेष प्रकार की खारी मिट्टी खोज निकाली
जिसमें कपड़े को नुकसान पहुँचाए बिना दाग और मैल हटाने का गुण था। आम तौर पर इसे ‘मिट्टी का साबुन’ कहा जाता है। भारतीय उपमहाद्वीप
में कपड़े धोने वाली जातियों को “धोबी” कहा जाता है। तेलुगु में उन्हें “चकली” और
तमिल में “वण्णन” कहा जाता है। महाराष्ट्र के गांवों में इन्हें “वट्ठी” कहा जाता
है। वट्ठी लोग जहा कपड़े धोते हैं उस स्थान को “वट्ठी घाट” या “धोबी घाट” कहा जाता
है। इन महिलाओं ने स्वच्छता के माध्यम से समाज को स्वस्थ रखने के लिए अपना योगदान
दिया।
सामाजिक
दर्जा
जाति व्यवस्था में यह जाति निचले
स्थान पर है। दक्षिण भारत में प्रथम मासिक धर्म पर होने वाले कर्मकांड तथा समारोह
के दौरान गंदे कपड़े धोने का काम यह जाति करती है। वही विवाह समारोह में पैसे लेकर
कपड़ा धोने का काम भी करती है। इन महिलाओं के द्वारा संपन्न इन कार्यों का कोई
सामाजिक दर्जा नहीं है।
गडरिया
महिलाएँ
कांचा आइलैया के अनुसार गड़रिया समुदाय
की स्त्रियाँ दुग्ध उद्योग में सक्रिय भाग लेती हैं। स्त्रियों ने ही दूध दोहने, उबालने, और दूध को दही, पनीर
और खोवे में बदलने की कला को परिष्कृत किया। उन्हें ही पता लगा कि दही से मक्खन बन
सकता है और मक्खन से घी। अतः बुनियादी दुग्ध उद्योग की शुरुआत का श्रेय गड़रिया
समुदाय की स्त्रियों को जाता है। उन्होंने विभिन्न ऊनी उत्पादों को विकसित करने
में और पशुओं के उपचार में भी अहम भूमिका निभाई।
भारतीय
समाज व्यवस्था में ऐसी कई जातियाँ है जिन्होंने अपनी कला, कौशल और कठोर परिश्रम के आधार पर समाज, संस्कृति और
सभ्यता को बनाए रखा उसकी सिंचाई की। लेकिन उनके सभी तरह के योगदान और खोजों को केवल जाति के सीमित दायरे में बंद कर दिया
गया। जिसका परिणाम यह हुआ कि देश को विकसित करने में उनके श्रमगत ज्ञान का जितना
उपयोग होना चाहिए था वह नहीं हो पाया और खोज करने वाले समूह अन्यायपूर्ण जीवन जीने
के लिए मजबूर हुए। अर्थात श्रम और व्यक्ति दोनों को हाशिए पर रखकर जाति को केंद्र
में रखा गया। भारतीय इतिहास, सभ्यता और संस्कृति का यह अनाकलनीय
सत्य है।
संदर्भ
1.
आइलैया, कांचा. (2009). हमारे
समय में श्रम की गरिमा.
2. दुबे,
लीला.(2004). लिंगभाव
का मानववैज्ञानिक अन्वेषण : प्रतिच्छेदी क्षेत्र.
3. काले, किशोर शांताबाई. (2009). कोल्हाटयाचं पोर.
4. निंबालकर,
स्नेहलता. (2014). उद्रेक : महिला समस्यांच्या सुप्त ज्वालामुखीचा.
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