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वैश्विक बौद्धिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करती सावित्रीबाई फुले - अस्मिता राजुरकर



दुनिया में दो तरह की बौद्धिक परंपराएँ है, एक परंपरा समाज को निरंतर बेहतर बनाने के लिए और व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकार बहाल करने के लिए काम करती हैं तो दूसरी परंपरा समाज को लगातार यथास्थिति में रखने के लिए बौद्धिकता का विकास करती हैं। इन दो बौद्धिक परंपराओं में सावित्रीबाई फुले की एक बुद्धिजीवी के रूप में लोकेशन को देखते हैं, तो हम पाते हैं कि सावित्रीबाई विश्व की उस बौद्धिक संस्कृति और परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं जो प्लेटो, अरस्तू से शुरू होकर डॉ. अम्बेडकर तक एक समाजोन्मुख बौद्धिकता का विकास करती हैं, जो व्यक्ति को समाज में एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार्यता प्राप्त करने के लिए किस तरह की सोच का होना आवश्यक है और समाज को गतिशील रखने के लिए स्त्री और पुरुषों के बीच जो सामाजिक संबंध है उसे निरंतर बेहतर बनाने के लिए अपना बौद्धिक एवं सामाजिक योगदान देते हैं।
          सावित्रीबाई फुले अपने समय में एक वैश्विक बौद्धिक परंपरा को बनाने में योगदान देती हैं, चाहे वो स्त्री पुरुष समानता हो, भाषा का सवाल हो या फिर सामाजिक मातृत्व (social motherhood) हो या वे सारी सामाजिक परंपराएँ हो जो व्यक्ति को एक विश्व मानव बनने के लिए सहायक सिद्ध हो सकती हैं। स्त्री पुरुष समानता पर सावित्रीबाई फुले का पूरा जीवन संघर्ष एक नई दृष्टि प्रदान करता है। एक विकासात्मक और समायोजित स्त्री पुरुष संबंधों को वे प्रयुक्त करती दिखायी पड़ती हैं। साथ ही सामाजिक मातृत्व की संकल्पना को सावित्रीबाई द्वारा एक विधवा के बेटे यशवंत का दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार करना और उसका समाज में एक सम्मानित व्यक्तित्व निर्माण करना उनके सामाजिक मातृत्व को दर्शाता है, जो स्थापित धार्मिक रचनाओं से चली आ रहीं अब तक की जैविक मातृत्व की संकल्पना को तोड़ती हैं और उसपर प्रश्न चिन्ह खड़े करती हैं। यशवंत को दत्तक लेना उसका संगोपन करना सावित्रीबाई फुले के  सामाजिक मातृत्व के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाता है। सावित्रीबाई फुले के इसी दृष्टिकोण को समकालीन नारीवादी भी महिलाओं पर मातृत्व के नाम पर थोपे जा रहें सामाजिक नियमों, परंपराओं और विभिन्न तकनीकि उपायों को नकारते हैं जो महिलाओं को एक व्यक्ति और एक बौद्धिक प्राणि के रूप में अस्विकार कर केवल एक जैविक पुनरुत्पादन की मशीन के रूप में स्थापित करती हैं। नारीवादी इसे नकारने के लिए  समाज के अनाथ बच्चों को दत्तक लेकर उन्हें नया जीवन देने और सामाजिक मातृत्व को स्वीकार करने की बात करती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि सावित्रीबाई फुले के विचार वैश्विक नारीवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं और साथ ही भारतीय नारीवाद के लिए जमीन तैयार करते हैं।
           सामाजिक मातृत्व आज के समय में थाईलैंड जैसे बुद्ध के शांतता प्रिय विचारों पर चलने वाले देश के संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सावित्रीबाई फुले शायद इसे नहीं जानती होगी लेकिन सामाजिक दायित्व, सामाजिक समानता, व्यक्ति की गरिमा यह उनके व्यक्तित्व के महत्त्वपूर्ण पहलू थे जो ऐसे समाजोन्मुख विचारों और कृतियों के तरफ उनका ध्यान लगातार आकर्षित करते रहते थे। सावित्रीबाई फुले के यही विचार उन्हें विश्व के उस परंपरा के साथ जोड़ते हैं जो परंपरा समाज को निरंतर बेहतर बनाने के लिए प्रयासरत रहती हैं।   
          सावित्रीबाई फुले इंग्लिश भाषा को मुक्ति (liberation) की भाषा मानती हैं और आगाह करती हैं कि जिन भाषाओं में गुलामी का दस्तावेज है उसे स्वीकारना मुक्ति से दूर जाना है। ध्यान देने की बात यह है कि उसी इंग्लिश भाषा के माध्यम से डॉ. अम्बेडकर मानव मुक्ति का दस्तावेज दुनिया के सामने रखते हैं, यह सिद्ध करता हैं कि सावित्रीबाई की सोच आनेवाली पीढ़ी के लिए थी जो उनकी बौद्धिक दूरदृष्टि का प्रमाण देती हैं। आज वैश्वीकरण में सावित्रीबाई के विचार अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध होते हैं जो वैश्विक संस्कृति के अनुसार व्यक्ति निर्माण करने में एक दीपस्तंभ का काम करेंगे।
          सावित्रीबाई फुले ने बिना किसी झिजक के ज्योतिबा फुले के साथ काम करना शुरू किया। जिस समाज में पति-पत्नी होते हुए भी एक दूसरे से न केवल भौतिक दूरी बनाएं रखना नियम था बल्कि वैचारिक रूप से दोनों में भिन्नता होना समाज को यथावत रखने के लिए आवश्यक माना जाता था उस समय में सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक रूप से न केवल भौतिक तरह से उस दूरी को कम किया बल्कि वैचारिक रूप से भी अपने आप को ज्योतिबा फुले के समकक्ष स्थापित किया। आज वैश्विक संस्कृति में मिशेल- ओबामा एक दूसरे के साथ सम्मानित महसूस करते हैं जो एक वैश्विक संस्कृति का परिचायक है और जो स्त्री-पुरुषो के बीच के बौद्धिक, वैचारिक एवं भौतिक दूरी को कम करता है उस संस्कृति को सावित्रीबाई ने अपने समय में समाज के सामने रखा था।
          दुनिया में एक महिला द्वारा महिलाओं को शिक्षित करने का आंदोलन बहोत कम देखने को मिलता है। सावित्रीबाई का यह आंदोलन बौद्धिक परंपरा में महिलाओं की भागीदारी निश्चित करने के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। यह महिलाओं में कौशल विकास लाने जैसे कार्यक्रमों से एकदम भिन्न आंदोलन था। उनकी महिलाओं में बौद्धिक परंपरा को आगे ले जाने की इच्छा ने मुक्ता साळवे जैसी लड़कियों को पैदा किया जिसने अपने विचारों के माध्यम से व्यवस्था पर प्रश्न खड़े किए। आज पूरी दुनिया में नारिवादी बौद्धिकता समाज व्यवस्था को लेकर जिन प्रश्नों को खड़ा कर रही है उसको मजबूत करने के लिए सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों में बौद्धिकता को जन्म देकर नारिवाद जैसे बौद्धिक आंदोलन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और वैश्विक नारिवाद में अपने आप को सिद्ध किया।      
          सावित्रीबाई के सपने का स्त्रीमुक्ति आंदोलन एक बौद्धिक नारीवादी आंदोलन था। आज हम देखते है कि डॉक्टर इंजीनियर बनकर अपने पैरो पर खड़ा होना ही आज सावित्रीबाई फुले का आंदोलन माना जा रहा है। लेकिन वास्तव में सावित्रीबाई का आंदोलन इससे काफी ऊपर था। वे महिलाओं में बौद्धिकता को पैदा करना चाहती थी। राज्य भी महिलाओं के कौशल विकास पर अधिक ध्यान देता है न कि उनके बौद्धिकता के विकास पर। बौद्धिकता का विकास महिलाओं का सामाजिक लक्ष्य है जिससे समाज परिवर्तन की लड़ाई लड़ी जा सकती है इस बात को सावित्रीबाई ने बखूबी जाना था इसलिए उन्होंने अपना पूरा ध्यान महिलाओं में बौद्धिकता का विकास करने पर केन्द्रित किया।
              सावित्रीबाई फुले द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में पैर रखना महिलाओं के सार्वजनिक क्षेत्र (public spare) में प्रवेश रखने की शुरुआत थी। सार्वजनिक दायरा जो महिलाओं के लिए हमेशा से ही प्रतिबंधित रहा है उसे तोड़ने के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम था।  सार्वजनिक क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाओं को हमेशा से ही असम्मानित और घृणास्पद दृष्टि से देखा और प्रस्तुत किया जाता था क्योंकि महिलाओं के लिए सार्वजनिक क्षेत्र का अर्थ उनकी आर्थिक स्वतंत्रता, उनकी रीजीड जेंडर लोकेशन को शिथिल करना, बाहरी या सार्वजनिक दुनिया को देखने समझने का मौका मिलना और स्वतंत्रता के मायने समझना    था। महिलाओं से संबंधित यह सभी बाते उनके बौद्धिकता का विकास करने में पोषक थी जो जातिसत्ता और पितृसत्ता को ध्वस्त करने के लिए जरूरी होती हैं। सावित्रीबाई फुले ने जातिसत्ता और पितृसत्ता की संरचना को अपने प्रत्यक्ष जीवन में विखंडित करने का सफल प्रयास किया। एक छोर पर वह लगातार महिलाओं को शिक्षित कर पितृसत्ता के इरादों को विफल करती रही तो दूसरी ओर उन्होंने जातिसंरचना जिसका बुनियादी आधार जातिय विवाह और पुनरुत्पादन है उसे तोड़ने का प्रयास किया। जिसे आगे चलकर डॉ. अम्बेडकर ने सांविधानिक रूप से वैध बनाया और भारतीय समाज से जाति व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए उसे एक जरूरी शर्त के रूप में माना। 
सावित्रीबाई फुले के कार्य और इसके पीछे की उनकी सोच में उस क्रांति की झलक दिखती है जिसने दुनिया की सामाजिक संरचना में एक बड़ा बदलाव लाने का कार्य किया। उनके विचारों और कार्यों में एक वैश्विक बदलाव की चाह स्पष्ट रूप से दिखती है। भारत की आने वाली पीढ़ी की दिशा किस तरफ होनी चाहिए, उनकी संस्कृति कौनसी होनी चाहिए इसका स्पष्ट चिंतन सावित्रीबाई फुले ने अपने विचारों में रखा। समय के साथ जो व्यक्ति अपने विचारों में परिवर्तन लाता है और भविष्य की दिशा तय करता है उसे ही बुद्धिजीवी कहा जाता है और सावित्रीबाई फुले में यह बुद्धिजीवीता स्पष्ट रूप से दिखती है जो उन्हें और उनके विचारों को वैश्विक बनाती है। दुनिया में एक सकारात्मक बदलाव लाने की उनकी कोशिश एक सकारात्मक बौद्धिक परंपरा को और अधिक मजबूत बनाती है। 

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