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मानव सभ्यता एवं श्रम : एक विश्लेषण - अस्मिता राजुरकर


            
मानव सभ्यता एवं श्रम : एक विश्लेषण

    श्रम मनुष्य की बुनियादी गतिविधि है। मानव सभ्यता का विकास श्रम शक्ति का ही परिणाम है। मानव सभ्यता के शुरुआती दौर में अपने मानव अस्तित्व के लिए श्रम को महत्वपूर्ण माना। कंद मूल और प्राणियों की शिकार से अपनी आजीविका चलाने से लेकर जमीन जोतने और जमीन का उत्पादन बढ़ाने के लिए औज़ार तैयार करने तथा जानवरों और मनुष्य की संख्या बढ़ाने तक सफर उसने पूरा किया। इस सफर के दौरान ही निजी संपत्ति की संकल्पना का विकास हुआ और पुरुष अपने समकक्ष जेंडर के बारे में सोचने लगा। फ़्रेडरिक एंगेल्स निजी संपत्ति की संकल्पना को ही महिलाओं की गुलामी या अधीनता की शुरुआत मानते हैं । महिलाओं में पुनरुत्पादन की नैसर्गिक शक्ति होने के कारण वंश की निर्मिति में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी और निजी संपत्ति के लिए वंश की शुद्धता जरूरी थी। इसका परिणाम महिलाओं की गतिशीलता पर हुआ। उनके श्रम कार्यों को सीमित किया गया और कई पीढ़ियों तक महिलाएँ एक सीमित दायरे में श्रम कार्यों को करने के कारण वह नैसर्गिक लगने लगी। लेकिन महिलाओं की यह श्रमिक गतिविधियाँ एक लंबी यात्रा का परिणाम थी और है।
          समाजशास्त्र में मैक्स बेबर, मरडोक, आदि लोगों ने महिला और पुरुष के श्रम विभाजन पर अपने अध्ययनों के निष्कर्ष के रूप में अपनी बात रखी है। लेकिन समाजशास्त्र में इस दृष्टि से एन ओकली द्वारा किया गया अध्ययन महत्वपूर्ण है। एन. ओकली कहती है कि समाज में कई तरह की भिन्नताएँ है, इसलिए किसी भी तरह के श्रम को हम सार्वभौमिक नहीं मान सकते और उसके होने का कोई कारण भी नहीं है। अपने इसी तर्क के आधार पर वह कहती है कि जेंडर आधारित जो श्रम विभाजन है वह जेंडर आधारित न होकर सांस्कृतिक श्रम विभाजन है। श्रम का यह विभाजन मानव इतिहास की एक बड़ी घटना थी जिसने मानव के नैसर्गिक क्षमता को नष्ट कर दिया। और दो तरह की मानव प्रजातियों में एक द्वद्व की स्थिति को पैदा किया। इस द्वद्व से आज भी हम प्रभावित हो रहे हैं। आज जिस प्रकार का श्रम महिलाएँ और पुरुष कर रहे हैं वह नैसर्गिक नहीं है। महिलाओं और पुरुषों में दो दायरों का विकास हुआ एक निजी और एक सार्वजनिक, निजी दायरे में महिलाओं ने रहने  के कारण उनकी सार्वजनिक दायरे की क्षमता कम होती गई और सार्वजनिक दायरे के कारण पुरुषों के निजी दायरे का विकास नहीं हुआ। अर्थात श्रम के मामले में कोई भी परिपूर्ण नहीं हो पाया। पुरुष और महिलाओं की इसी जेंडर आधारित स्थिति के कारण आधुनिक पेशों का विकास इसी दिशा में हुआ और निजी दायरों से संबंधित पेशे महिलाओं के लिए संरक्षित किए गए और सार्वजनिक दायरों से संबंधित पेशे पुरुषों के लिए संरक्षित किए गए। पेशों के निर्माण की यह प्रक्रिया भी नैसर्गिक ही लगने लगी लेकिन जब नारिवाद ने इसपर सवाल किए तब इसपर पुनर्विचार शुरू हुआ।   





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