क्या तुम्हारी
देह मटेरियल मात्र हैं
क्या तुम्हारा
हसना
रोना
भी मटेरियल बना है।
क्या तुम्हारे
सपने नही है।
क्या तुम्हारे पास
अपने विचार नहीं है।
क्या तुमने
सोचना बंद किया है।
क्या तुम अभी
दुनिया के तुम्हारे प्रति
दृष्टिकोन पर विश्वास
करणे लगी हो
दुनिया तुम्ह बुद्धीहीन मानती है
और तुम भी
बुद्धीहीनता में गर्व मानती हो।
तुमें स्वीकारयता
के साथ कुछ भी
बनाया जा सकता है
तुम जाणते हुये भी
अपने स्वार्थ के लिए उसे मानती हो
लेकीन एक बात
याद रखना
तुम्हारी पिढीया इससे कमजोर
हो रही है।
और इसके लिए
तुम्ह भी उतना ही
जिमदार माना जायेगा
जितना की इस व्यवस्था और
परंपराओ को
इसलिए
निर्णय और रास्ता तुम्हारा है......
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