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Showing posts from January, 2019

वैश्विक बौद्धिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करती सावित्रीबाई फुले - अस्मिता राजुरकर

दुनिया में दो तरह की बौद्धिक परंपराएँ है , एक परंपरा समाज को निरंतर बेहतर बनाने के लिए और व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकार बहाल करने के लिए काम करती हैं तो दूसरी परंपरा समाज को लगातार यथास्थिति में रखने के लिए बौद्धिकता का विकास करती हैं। इन दो बौद्धिक परंपराओं में सावित्रीबाई फुले की एक बुद्धिजीवी के रूप में लोकेशन को देखते हैं , तो हम पाते हैं कि सावित्रीबाई विश्व की उस बौद्धिक संस्कृति और परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं जो प्लेटो , अरस्तू से शुरू होकर डॉ. अम्बेडकर तक एक समाजोन्मुख बौद्धिकता का विकास करती हैं , जो व्यक्ति को समाज में एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार्यता प्राप्त करने के लिए किस तरह की सोच का होना आवश्यक है और समाज को गतिशील रखने के लिए स्त्री और पुरुषों के बीच जो सामाजिक संबंध है उसे निरंतर बेहतर बनाने के लिए अपना बौद्धिक एवं सामाजिक योगदान देते हैं।           सावित्रीबाई फुले अपने समय में एक वैश्विक बौद्धिक परंपरा को बनाने में योगदान देती हैं , चाहे वो स्त्री पुरुष समानता हो , भाषा का सवाल हो या फिर सामाजिक मातृत्व...