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Showing posts from December, 2018

जातिगत श्रमिक गतिविधियों में महिलाएँ - अस्मिता राजुरकर

                                                                श्रम मनुष्य जीवन की बुनियादी गतिविधि और जीवन की हकीकत है। विश्व में जहां जाति व्यवस्था विद्यमान नहीं है वहा भी लोग श्रम करते हैं। लेकिन भारत और विश्व के अन्य देशों के श्रमिक गतिविधियों में अंतर इतना है कि यहाँ एक व्यक्ति जिस काम को करता/करती है उसकी आनेवाली पीढ़ियों को वही काम पीढ़ी दर पीढ़ी करना पड़ता है। श्रम के इस जातिगत व्यवस्थापन में श्रम का कोई मूल्य नहीं रहता और न ही उस श्रमिक गतिविधियों को संपन्न करने वाले समूह के प्रति सम्मान। बल्कि उस श्रम कार्य को और उस जाति में जन्म लेने को ‘ पाप ’ की श्रेणी में रखकर एक सहज प्रक्रिया का हिस्सा समझा जाता है।             श्रम पहले हैं और जाति बाद में। भारत में जो समूह जिस तरह के श्रम कार्यों को करते थे उन्हें जाति का टैग लगाकर स्थायी क...